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Monday, 16 September 2013

खोटा धन, खरा इंसान

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Money or Relationship
Money or Relationship
     धन की खोट आदमी को तब मालूम होती है, जब वह खरा बनने लगता है। खरा बनने का अर्थ यह नहीं है कि इंसान घरबार छोड़ दे, जंगल में चला जाय और भगवान के चरणों में लौ लगाकर बैठा रहे। बहुत-से लोग ऐसा भी करते हैं, पर यह रास्ता सबका रास्ता नहीं है। ज्यादातर लोग तो दुनिया में रहते है और उनका वास्ता अपने घर के लोगों से ही नहीं, दूसरों के साथ भी पड़ता है।

खरा आदमी वह है, जो अपनी बुराइयों को दूर करता है और नीति का जीवन बिताते हुए अपने समाज के और देश के काम आता है। ऐसा आदमी सबकों प्रेम करता है। और सबके सुख-दु:ख में काम आता है। हज़रत मुहम्मद जहॉँ भी दु:ख होता था, वहॉँ फौरन पहुँच जाते थे। भगवान् बुद्ध ने न जाने कितनों की सेवा की। गांधीजी परचुरे शास्त्री के घावों को अपने हाथों से साफ़ करते थे। ये मामूली घाव नहीं थे, कुष्ठ के थे; उनमें से मवाद निकलता था, लेकिन गांधीजी बड़े प्रेम से शास्त्रीजी की सेवा करते थे। ऐसी मिसालें एक-दो, नहीं, सैकड़ों-हजारों है। जो मानव-जाति की सेवा करता है, उससे बड़ा धनी कोई नहीं हो सकता।

     अबू बिन अदम की कहानी आपने सुनी होगी। एक दिन रात को वह अपने कमरे में सो रहा था। अचानक उसकी आँख खुली। देखा कि सामने एक देवदूत बेठा कुछ लिख रहा हे। अदम ने पूछा, आप क्या लिख रहे हैं?

     उसने जवाब दिया, मैं उन लोगों के नाम लिख रहा हूँ, जो भगवान् के प्यारे हैं?

     अदम थोड़ी देर चुप रहां फिर बोला, भैया, मेरा नाम उन लोगों में लिख लेना, जो इंसान की सेवा करते है।

     देवदूत चला गया और अगले दिन जब वह लौटा तो उसके हाथ में उन आदमियों की सूची थी, जिन्हें भगवान् का आशीर्बाद मिला था। अबू बिन अदम का नाम सूची में सबसे ऊपर था। साफ है कि जो दूसरों की सेवा करता है, वह भगवान् की ही सेवा करता है।

     सेवा करने का अपना आनन्द होता है। एक बार सेवा करने की आदत पड़ जाती है तो फिर छूटती नहीं। जो बिना किसी स्वार्थ  दूसरो के दूसरों की सेवा करता है, उसका मुक़ाबला कोई नहीं कर सकता। सूरज बिना बदले की इच्छा रखे सबकों धूप और रोशनी देता है, चॉँद ठंडक पहुँचाता है, धरती अन्न देती है, पानी जीवन देता है, हवा प्राण देती है। इनकी बराबरी कौन कर सकता है!

     विनोबा के पास क्या रखा था? न धन, न कोई बाहरी सत्ता; पर सेवा के जोर पर उन्होंने करोड़ों लोगों के दिलों में अपना घर बना लिया। उन्हें चालीस लाख एकड़ से उपर जमीन मिली। सैकड़ों गॉँव ग्रामदान में मिले ओर जीवनदानियों की उनकी पास फौज़ इकट्ठी हो गयी। यह सब कैसे हुआ? सेवा के बल पर। जब विनोबा ने भूदान-यक्ष आरम्भ किया था, लोगों ने जाने क्या-क्या बातें कहीं थीं, पर विनोबा ने उनकी कोई परवा नहीं की। उनका भगवान पर विश्वास था; उनके दिल में कोई स्वार्थ न था। ऐसे आदमी को अपने काम में सफलता मिलनी ही थी। वह हज़ारों मील पैदल चले। जाड़ों में चले, गर्मियों में चले, वर्षा में चले, धूप में चले। लोगों ने कहा, बाबा, चलते-चलते बहुत दिन हो गये। थोड़ा आराम कर लो।

     जानते हैं, विनोबा ने क्या जबाबा दिया? उन्होंने कहा, सूरज कभी रूकता नहीं, चाँद कभी टिकता नहीं, नदी कभी थमती नहीं; मेरी भी यात्रा अखण्ड गति से चलेगी। 

विनोबा की पग-यात्रा कभी रूकी नहीं।

सेवा के आनन्द में लीन विनोबा चलते रहे, चलते रहे। देश का कोई भी कोना उन्होंने नहीं छोड़ा। प्रेम की निर्मल धारा उन्होंने घर-घर पहुँचा दी। एक दिन उनकी टोली में हम कई जने बैठे थे। शाम का समय था। उस दिन विनोबा को बहुत-सी जमीन मिली थी। जब उन्हें दिनभर का हिसाब बताया गया तो वह मुस्कराने लगे। बोले, आज इतनी जमीन हाथ में आयी है, लेकिन देखों, कहीं हाथ में मिट्टी चिपकी तो नहीं!

     हम सब हँस पड़े, पर विनोबा ने बड़े मर्म की बात कहीं थी। जिसके हाथों में लाखों एकड़ भूमि आयी हो, उसके हाथ में एक कण भी चिपका न रहे, इससे बड़ा त्याग और क्या हो सकता है।

     शरीर के दुबले-पतले विनोबा ने हम सबको दिखा दिया कि इंसान दुनिया में किसी का भी मूल्य नहीं है।

     एक सूफ़ी सन्त ने कहा है, किसी का दिल उसकी खिदमत करके अपने हाथों में ले, यही सबसे बड़ी इज्ज़त है। हज़ारों काबों से एक दिल बढ़कर है।

     गांधीजी ने तो सेवा-धर्म को, अहिंसा और सत्य दोनों की बुनियाद माना। उन्होंने कहा, सेवा-धर्म का पालन किये बिना मैं अहिंसा-धर्म का पालन नहीं कर सकता; और अहिंसा धर्म का पालन किये बिना मैं सत्य की खोज नहीं कर सकता।

     सेवा की बड़ी महिमा है। धन से आप कुछ लोगों को अपनी ओर खींच सकते हैं, सेना से कुछ और ज्यादा पर विजय पा सकते हैं, लेकिन सारी दुनिया को तो सेवक ही जीत सकता है।
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मेहनत की खरी कमाई।

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TRUE REAL INCOME
आप कहेंगे
, तुम सेवा की और प्रेम की बातें करते हो। हम भी उन्हें जानतें है। पर जिन्हें हर घड़ी पेट के लाले पड़े रहते हो, वे कहाँ से सेवा और कहाँ से प्रेम करें? उन्हे तो सबसे पहले रोटी चाहिए।

     आपकी बात सच है। भूखे को रोटी चाहिए और रोटी उसे हर हालत मे मिलनी चाहिए, लेकिन उतने से आदमी को सन्तोंष होता कहाँ है! पहली बात तो यह कि आदमी मेहनत नही करता, काम से बचता है; दूसरी बात यह कि वह खाने के लिए कम, बचाने के लिए अधिक कमाता है। गांधीजी ने लिखा है, "हर मेहनती आदमी को रोजी पाने का अधिकार है, मगर धन इकटठा करने का अधिकार किसी को नहीं है। सच कहें तो धन का इकटठा करना चोरी है। जो भूख से अधिक धन लेता है,वह जान मे या अनजान में, दूसरों की रोजी छीनता है।"

     आज दुनिया मे यही हो रहा है। एक ओर इतनी कमाई है कि आदमी खाकर हज़म नही कर सकता; दूसरी ओर इतना अभाव है कि आदमी पेट भरकर खा भी नही सकता। जहाँ ढेर होता है, वहाँ गडढा अपने आप हो जाता है। एक बुढिया की बड़ी मजेदार कहानी है। एक बड़ी ग़रीब बुढ़िया थी। बेचारी तंगी के मारे हैरान रहती थी। एक दिन किसी ने उससे कहा, माई पैसे से पैसा आता है।" वह बेचारी कहीं से एक पैसा जुटा लाई ओर पैसे के ढेर के पास खड़ी होकर लगी उसे पैसा दिखाने। थोड़ी देर मे उसका वह पैसा भी ढेर मे चला गया। वह रोने लगी। तब किसी ने उसे समझाया, "तू जानती नही, पैसा ढेर मे जाता है।"

     आज यही बात देखने मे आ रही है। कुछ लोग कहते है कि अमीरी और गरीबी किस ज़माने मे नही रही। पुराने समय से लेकर अब तक यह भेद चला आ रहा है। सब बराबर कैसे हो सकते है?

     इस तर्क मे बड़ी भूल है। ईश्वर ने सारे इंसानो को एक-सा बनाया है। आदमी आदमी मे कोई अन्तर नही रक्खा। अन्तर तो स्वयं आदमी ने पैदा किया है। एक आदमी दिमाग़ से काम करता है, दूसरा शरीर से। पहले को हम बड़ा मानते है और उसे अधिक पैसा देते है, दूसरे को किसान-मजूर कहकर छोटा मानते है। और उसकी कम कीमत लगाते है। लेकिन यह न्याय नही है। जो दिमाग काम करता है, उसे भी खाने को अन्न चाहिए और अन्न बिना शरीर की मेहनत के नही मिल सकता। शरीर से काम करे वाले को दिमागी काम करने वाले का सहारा चाहिए। इस तरह दोनों एक-दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरे का काम नही चल सकता।

     पर आज का समाज उन्हें एक-दूसरे का पूरक या साथी मानता कहाँ है? बुद्धि से काम करने वाला शरीर की मेहनत को छोटा और ओछा मानता है और उससे बचता है। वह मानता है  कि मजूर से मेहनत लेने का उसे अधिकार है। वह यह नही मानता कि

मजूर के प्रति उसका कोई कर्त्तव्य भी है। फल यह कि ईश्वर की दी हुई समानता को आदमी ने न सिर्फ नष्ट कर दिया है, बल्कि आदमी के बीच ऊँच-नीच की, छोटे-बड़े की, अमीरी-गरीबी की चौड़ी खाई भी खोद दी।

गांधीजी इसी खाई को पाटना चाहते थे। उन्होने रामराज्य की जो बात कही थी, उसके पीछे यही भावना थी। वह चाहते थे कि एक भी आदमी बिना अन्न के न रहे, सबको पहनने को कपड़े और रहने को घर मिले, सबको पढाई-लिखाई की सुविधा मिले और हारी-बिमारी के लिए दवा-दारू की व्यवस्था हो; यानी सबको विकास की समान सुविधाएँ हों। उनका तो यहां तक कहना था कि जब तक एक भी आंख मे आंसू है, तब तक लड़ाई की मंजिल पूरी नही सकती।

     यह खाई एकदम दूर हो जाए, तब तो कहना ही क्या! लेकिन आज के जमाने में वह बिल्कुल दूर न हो सके तो कम तो हो ही जानी चाहिए। हमारे समाज की बुनियाद नये मूल्यों पर रक्खी जानी चाहिए। धन को अब तक बहुत प्रतिष्ठा मिल चुकी है, उसकी जगह अब सच्चे इंसान को इज्ज़त मिलनी चाहिए। बौद्धिक और शारीरिक भ्रम के बीच जो दीवार खड़ी हो गयी है,वह टूटनी चाहिए। भ्रमका शोषण बंद होना चाहिए। हमारे सारे काम इंसान को, ग़रीबो के उस प्रतिनिधी का , जिसे गांधीजी ने दरिद्रनारायण कहा था, सामने रखकर होने चाहिए। भारत इसलिए भारत बना रहा कि उसने इंसानियत को ऊँची जगह दी। मानवता को वही मान देने का अब समय आ गया है।

     कहने का मतलब यह कि हर आदमी अपनी क्षमता के अनुसार काम करे और जरूरत के अनुसार पाये; कोई किसी का शोषण ने करे, न अपना होने दे; सब अपने-अपने कर्त्तव्य को जाने और मानें कि अधिकार तो कर्त्तव्य मे से अपने-आप आते है; सब सादगी से रहे ओर सबके बीच प्रेम का अटूट नाता हों।जब समाज की बुनियाद इन पक्के आधरों पर रखी जायेगी। तो हमारे सारे दुखऔरक्लेश अभाव और भेद, अपने-आप दूर हो जायेगें। तब आदमी धन और सत्ता, प्रभुत्व और वैभव, किसी के नीचे नही रहेगा, बल्कि उन सबके ऊपर रहेगा। मानव को इतना मान मिलेगा तो प्रभु ईसा के शब्दो मे धरती पर स्वर्ग उतरते देर नही लगेगी।
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Saturday, 14 September 2013

किसी भी हालात मे हिम्मत न हारे

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never give up
never-lose-confidence-in-yourself
    कहिए साहब, क्या मामला है? आप इतने उदास क्यों है। आपकी आंखों मे आंसू क्यों छलछला रहे है। आपके चेहरे पर हवाइयां क्यों उड़ रही है?

     ओहो, आप मुसीबतों मे जूझते-बूझते थक गये है। घर मे बीमारी है, बच्चो की पढाई का बोझ है, लड़की का जल्दी ही ब्याह होना है, बीसियों खर्च सिर पर है, पर पैसे की तंगी है। रात-दिन परेशानियों से आपका हौसला पस्त हो गया है, आपकी हिम्मत जवाब दे गयी है। चारों ओर अंधकार दिखाई देता है। कोई रास्ता ही नही सूझता।

     भाई, आपके साथ मेरी सहानूभूति है और मै चाहता हूं कि आपकी परेशानियां जल्दी-से-जल्दी दूर हो। पर मेरी एक बात का जवाब दीजिए। क्या आपके इतनी चिन्ता करने, इतना हैरान होने और निराश होकर हाथ-पर-हाथ रखकर बैठ जाने से आपकी कोई समस्या हल हुई है? हल होने में मदद मिली है? बीमारी को कोई फायदा पहुंचा हैं? बच्चों की पढाई का बोझ हल्का हुआ है? लड़की शादी के लिए रास्ता निकला है?

     वाह, आपने भी अच्छा सवाल किया! अजी, मुसीबत आती है तो किसे हैरानी नही होती? चोट लगती है तो किसके दर्द नही होता? जब चारों तरफ के रास्तें बंद हो जाते है तो किसका दिल नही टूटता? इंसान ही तो है! बहुत ज्यादा बोझ आखिर कब तक उठा सकता हैं।

     आपने इतनी बातें कह डाली, पर मेरे सवाल का ज़वाब मुझे नही मिला। मैने पूछा था कि क्या फ्रिक करने और हिम्मत हारने से आपकी मुश्किलें कम हुई? कठिनाइयों मे से रास्तें निकला?

     जी नही, मेरी समस्याएँ ज्यो-की-त्यों बनी है, बल्कि बढ़ी ही है।
     तब आप बताइए कि आपने चिन्ता करके, हिम्मत हार करके , क्या पाया? किसी ने ठीक ही कहा है, चिन्ता चिता के समान है। वह आदमी को खा जाती है और जो चिता के वश मे हाकर हौसला छोड़ बैठते है, उनकी नाव डूब जाती है। रूकावटें किसके रास्ते मे नही आती? लेकिन उनसे पार वे ही पाते है, जो उनके आगे सिर नही झुकाते, उनका मुक़ाबला करते हैं,

शुतुरमुर्ग का नाम आपने सुना होगा। जब कोई खतरा आता है तो वह डर के मारे अपना मुँह धरती मे गाड़ लेता है। जानते है, इसका नतीजा क्या होता है? बड़ी आसनी से मौत उसे अपने पंजे मे जकड़ लेती हैं।

     शुतुरमुर्ग जानवरर होता है और माना जाता है कि बहुत-से जानवरों मे अक़ल की कमी होती है। पर आदमी तो अक़लमन्द कहलाता है। ऐसी लाचारी उसके लिए शोभा नही देती। मर्द तो वह है, जिसकी हिम्मत के सामने तूफान भी थरथरा उठे।

     कोलम्बस की कहानी आपने पढ़ी होगी। वह एक छोटा-सा जहाज लेकर नयी दुनिया की खोज करने के लिए महासागर मे निकल पड़ा था। अचानक तूफान आ गया। तीन दिन तक उसका जहाज लहरों से टक्कर लेता रहा। इतने मे उसका एक मस्तूल ख़राब हो गया। उन दिनों जहाज इंजन से नही चलते थे। ऊँची बल्लियँ। लगाकर उन पर पाल तान देते थे। पालों में हवा भर जाती थी और उससे जहाज चलते थे।

मस्तूल का खराब होना मामूली बात  नही थी। उसके मानी थी जहाज का खतरा, आदमियों की जान को ख़तरा। उसके संगी-साथी घबरा गये। उन्होने कहा, "अब हम आगे नही जायेगें। देश लौट  जायेंगें। कोलम्बस बड़ा साहसी था। उसने मॉँझियों का  हौसला बढ़ाया। बोला, "जरा-सी बात पर हाथ-पैर फुला दोगे तो उससे क्या होगा? तूफान हमारी परीक्षा ले रहा है। हम हार नही मानेगें।"

     मॉँझियों की खोई हिम्मत लौट आयी। पर ज़रा आगे बढ़े कि उनकी कुतुबुनुमा बिगड़ गयी। कुतुबुनुमा दिशा बताने वाली घड़ी होती है। उसके ख़राब होने से यह पता लगना कठिन हो गया कि वे किधर जा रहे है। पर कोलम्बस की रग-रग मे हिम्मत भरी थी। मॉँझियों को

समझाकर उसने कहा, "मै आपसे कहता हूँ, कितनी भी मुश्किले आयें, पर जीत हमारी जरुर होगी।"
     और उसकी बात सच निकली। वे आगे बढते गये। उनके हर्ष का ठिकाना न रहा, जब उन्हें अकस्मात् पानी पर झाड़ियों की लकड़ियॉँ तैरती दिखाई दी और आकाश मे उड़ते हुए पक्षी नज़र आये। उन्हे नयी दुनिया मिल गयी, जिसकी तलाश मे वे निकले थे।

     अब आप बताइए, अगर तूफान के आने, मस्तूल के खराब होने और कुतुबनुमा के बिगड़ जाने पर कोलम्बस ने हार मान ली होती तो क्या होता? दुनिया एक बहुत बड़ी खोज से वंचित रह जाती।

     कार्लाइल दुनिया का बहुत बड़ा लेखक हुआ हैं। उसने फ्रांस की क्रान्ति का इतिहास लिखने मे बड़ी मेहनत की। उसका पहला भाग छपने जानेवाला था कि एक मित्र उसे पढ़ने ले गये। मित्र की गलती से वह घर के फर्श पर गिर पड़ा और नौकरानी ने उसे रद्दी काग़ज़ समझकर आग जलाने के काम मे ले लियां। मित्र को मालूम हुआ तो बड़े दुखी हुए, पर कार्लाइल के माथे पर शिकन तक न आयीं। महीनों तक उसने सैकड़ो किताबों, हस्तलिखित पत्रों ओर घटनाओं के हालों को फिर से पढा और उस ग्रन्थ्र को दोबारा लिखकर ही माना।

     किसी ने ठीक ही कहा है, "जीवन की धारा जब किसी गीत की तरह बहती हो तो उस समय पुलकित होना काफी आसान है; लेकिन असली अदमी तो वह है, जो सबकुछ उल्टा होने पर भी मुस्करा सके।"

     विनोबाजी ने  बड़े पते की बात कही-"चिन्तन करो, चिन्ता नही", यानी सामने कोई कठिनाई आवे तो उसमें से निकलने का रास्ता सोचो, हताश मत होओ।

     ईसाइयों के धर्म-ग्रन्थ बाइबिल मे प्रभु कहते है, "जो मुसीबतों पर विजय पाता है, उसके लिए मै अपने तख्त पर जगह रखता हूँ।"
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