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Friday, 20 September 2013

नीति के नियम - In Hindi - by - Gandhiji

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Neeti-ke-niyam
     अमुक काम अच्छा है या बुरा, इस बारे में हम सदा मत प्रकट किया करते हैं। कुछ कामों से हमें संतोष मिलता है और कुछ हमारी अप्रसन्नता के कारण होते हैं। कार्य-विशेष के भले या बुरे होने का आधार इस बात पर नहीं होता कि वह काम हमारे लिए लाभजनक है या हानिकारक, पर उसकी तुलना करने में हम जुदे ही पैमाने से काम लिया करते हैं। हमारे मन में कुछ विचार रम रहे होते हैं, उन्हीं के आधार पर हम दूसरे आदमियों के कामों की परीक्षा किया करते हैं। एक आदमी ने दूसरे आदमी का कोई नुक़सान किया हो

उसका असर अपने ऊपर हो या न हो, उस काम को हम खराब मानते हैं। कितनी ही बार नुकसान करनेवाले की ओर हमारी हमदर्दी हो तो उसका काम बुरा है, वह कहते हमें तनिक भी हिचक नहीं होती। यह भी हो सकता है कि कितनी ही बार हमारे राय गलत ठहरे। मनुष्यों का हेतु हम सदा देख नहीं सकते, इससे हम परीक्षा किया करते हैं। फिर भी हेतु के प्रमाण में काम की परीक्षा करने में बाधा नहीं होती। कुछ बुरे कामों में हमें लाभ होता है, फिर भी हम मन में तो समझते ही हैं कि वे बुरे हैं।

     अत: यह सिद्ध हुआ कि किसी काम के भले या बुरे होने का आधार मनुष्य का स्वार्थ नहीं होता। उसकी इच्छाएं भी इसका आधार नहीं होतीं। नीति और मन की वृत्ति के बीच सदा सम्बन्ध देखने में नहीं आता। बच्चे पर ममता होने के कारण हम उसे कोई खास चीज देखा चाहते हैं कि उसे देने में अनीति है। स्नेह दिखाना बेशक अच्छी बात है, पर नीति-विचार के द्वारा उसकी हद न बांध दी गई हो तो वह विषरुप हो जाता है।

     हम यह भी देखते हैं कि नीति के नियम अचल हैं। मत बदला करते हैं, पर नीति नहीं बदलती। हमारी आंखें खुली हों तो हमें सूरज दिखाई देता है, बन्द हों तो नहीं दिखाई देता। इसमें हमारी निगाह में हेर-फेर हुआ, न कि सूरज के होने में। नीति के नियमों के बारे में भी यही समझना चाहिए। हो सकता है कि अज्ञान दशा में हम नीति को न समझ सकें। जब हमारा ज्ञानचक्षु खुल जाता है तब हमें समझने में कठिनाई नहीं पड़ती। मनुष्य सदा भले की ओर ही निगाह रखे, ऐसा क्वचित् ही होता है। इससे अक्सर स्वार्थ की दृष्टि से देखकर अनीति को नीति कहता है।

ऐसा समय तो अभी आने को है जब मनुष्य स्वार्थ का विचार त्याग कर नीति-विचार की ओर ही ध्यान देगा। नीति की शिक्षा अभी बिलकुल बचपन की अवस्था में है। बेकन और डार्विन के पहले शास्त्र की जो स्थिति थी वही आज नीति की है। लोग सच्चा क्या है, उसे देखने को उत्सुक थे। नीति के विषय को समझने के बदले वे पृथ्वी आदि के नियमों की खोज में लगे हुए थे। ऐसे कितने विद्वान आपको दिखाई दिये हैं, जिन्होंने लगन के साथ कष्ट सहकर पिछले वहमों को एक ओर रखकर नीति की खोज में जिन्दगी बिताई हो? जब प्राकृतिक रहस्यों की खोज करने में तल्लीन रहें तब हम यह मानें कि अब नीति-विचार के विषय के विचार इकट्ठे किये जा सकते हैं।

शास्त्र या विज्ञान के विचारों के विषय में आज भी विद्वानों में जितना मतभेद रहता है उतना नीति के नियमों के विषय में होना मुमकिन नहीं। फिर भी हो सकता है कि कुछ अरसे तक हम नीति के नियमों के विषय में एक राय न रख सकें, पर उसका अर्थ यह नहीं है कि हम खरे-खोटे का भेद नहीं समझ सकते।

हमने देख लिया कि मनुष्यों की इच्छा से अलग नीति का कोई नियम है, जिसे हम नीति का नियम कह सकते हैं। जब राजनैतिक विषयों में हमें नियम-कानून दरकार है तब क्या हमें नीति के नियमों का प्रयोजन नहीं है, भले ही वे नियम मनुष्य-लिखित न हों? वह मनुष्य-लिखित होना भी न चाहिए। और अगर हम नीति-नियमों को अस्तित्व स्वीकार करें तो जैसे हमें राजनैतिक नियमों के अधीन रहना पड़ता है, वैसे ही नीति के नियमों के अधीन रहना कर्तव्य है। नीति के नियम राजनैतिक और व्यवसायिक नियमों से अलग तथा उत्तम हैं। मुझसे या दुसरे किसी से यह नहीं बन सकता कि व्यवसायिक नियमों के अनुसार न चलकर मैं गरीब बना हूं तो क्या हुआ?

     यों नीति के नियम और दुनियादारी के नियम के बीच भारी भेद है, क्योंकि नीति का वास हमारे हृदय में है। अनीति का आचरण करनेवाला मनुष्य भी अपनी अनीति कबूल करेगाझूठा सच्चा कभी नहीं हो सकता। और जहां जन-मानस बहुत दुष्ट हो, वहां भी लोग नीति के नियमों का पालन न करते हों तो भी पालन को ढोंग करेंगे, अर्थात् नीति का पालन कर्त्तव्य है, यह बात वैसे आदमियों को भी कबूल करनी पड़ती है। ऐसी नीति की महिमा है। इस प्रकार की नीति रीति-किरवाज जहां तक नीति के नियम का अनुसरण करता दिखाई दे, वहीं तक नीतिमान पुरुष को वह बंधनकारक है।

     ऐसा नीति का नियम कहां से आया? कोई राजा, बादशाह उसे गढ़ता नहीं, क्योंकि  भिन्न-भिन्न राज्यों में जुदा-जुदा कानून-कायदे देखने में आते हैं। सुकरात के जमाने में, जिस नीति का अनुसरण वह करता था, बहुत-से लोग उसके विरुद्ध थे, फिर भी सारी दुनिया क़बूल करती है कि जो नीति उसकी  थी वह सदा रही है और रहेगी। अंग्रेजी कवि राबर्ट ब्राउनिंग कह गया है कि कभी कोई शैतान दुनिया में द्वेष और झूठ की दुहाई फिरा दे तो भी न्याय, भलाई और सत्य ईश्वरीय ही रहेंगे। इस पर से यह कह सकते हैं कि नीति के नियम सर्वोपरि और ईश्वरीय हैं।

     ऐसे नियम का भंग कोई प्रजा या मनुष्य अंत तक नहीं कर सकता। कहा है कि जैसे भयानक बवंडर अंत में उड़ जाता है, वैसे ही अनीतिमान पुरुष का भी नाश होता है। असीरिया और बेबीलोन में अनीति का घड़ा भरा नहीं कि तत्काल फूट गया। रोग ने जब अनीति का रास्ता पकड़ा तब उसके महान पुरुष का बचाव न कर सके। ग्रीस की जनता बुद्धिमान थी, पर उसकी बुद्धिमानी अनीति को टिका न सकी। फ्रांस में जब विप्लव हुआ, वह भी अनीति के हीं विरोध में। वैसे ही अमेरिका में भला वेंडल फिलिप्स कहता है कि अनीति राजगद्दी पर बैठी हो तो भी टिकने की नहीं। नीति के इस अद्भूत नियम का जो मनुष्य पालन करता है वह ऊपर उठता है; जो कुटुम्ब-पालन करता है वह बना रह सकता है और जिस समाज में उसका पालन होता है, उसकी वृद्धि होती है; जो प्रजा इस उत्तम नियम का पालन करती है वह सुख, स्वतंत्रता और शांति को भोगती है।

ऊपर के विषय से मेल खाने वाली एक कविता है:

मन तुहिं तुहिं बोले रे, आसुपना जेवु तल तारुं;
अचानक उड़ी जाशे रे, जेम देवतामां दारुं।
झाकल जलपलमा वलीजाशे, जेम कागलने पाणी;
काया वाड़ी तारी एम करमाशे, थइ जाशे धूलधाणी।
माछलथी पस्ताशेरे, मिथ्या करी मारुं मारुं।
काचनो कुंपो काया तारी, वणसतां न लागे वार।
जीव काया ने सगाई केटली, मूकी चाले बनमोझार
फोकट पुल्यां फरवुंरे, आचिन्तु थाशे अधारुं।
जायुं ते तो सर्वें जवानुं, अगरवानो उधारो;
देव, गांधर्व राक्षसने माणस सउने मरणानो वारो।
आशानो महेल उंचोरे, नीचुंआ काचुंकारभारुं।
चंचल चित्तमां चेती ने चालो, भालो हरिरुं नाम,
परमारथ जे हाथे ते साथे करो रहेवानो विश्राम।
धीरो धराधरथीरे कोई न थी रहेनारुं....मन०

भावार्थ

मन, यह जो तू अपना-अपना कहता है तेरा सपने के जैसा है अचानक इस तरह उजड़ जायगा कागज पर पानी के समान। उसी प्रकार तेरी कायारुप बाड़ी सूखकर नष्ट हो जायेगी। पीछे पछतायगा। तू व्यर्थ मेरा मेरा करता है। तेरी काया शीशे की कुप्पी जैसी है, उसके नष्ट होते देर न लगेगी। जीव और देह का नाता ही कितना? एक दिन अंधकार हो जायगा। जो जन्मा है वह सभी जाने वाला है, इसमें से बचना कठिन है।

देवता, गंधर्व, राक्षस, मनुष्य सबके मरण का दिन नियत है। आशा का महल ऊंचा और इस दुनिया का कच्चा कारोबार नीचा है। तू चंचल चित्त में चेतकर चल और भगवान का नाम ले। जो परमार्थ कमा लेगा वही साथ जायगा। ऐसा ठिकाना पाने का उपाय कर, जहां तेरी आत्मा को विश्राम मिले।

धीरो (भगत) कहता है कि इस पृथ्वी के ऊपर कोई नहीं रहने वाला है।

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कैसे हासिल करे बड़े लक्ष्यों को ?

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Achieve-big-dreams-goals


इन बातो को ध्यान में रखकर... 

किसी भी तरह के लक्ष्यों को पाया जा सकता है। आसानी से कुछ भी नहीं मिलता। पर कोशिश करने से, द्रढनिश्चय से जीत मिलती है। और यही विश्वास में आप सभी के साथ बाँट रहा हूँ  

आइये जानते है...



विश्वास -1 :  जो भी होता हैं वो किसी Reason के लिए ही होता हैं। 

मैं इस बात को पूरे भरोसे से कह सकता हूँ की जितने भी महान लोग, जितने भी सफल हुए है, उनमे एक बात समान रही। उन सभी का मानना रहा हैं की जो कुछ भी होता हैं वो किसी सटीक उद्देश्य के लिए होता हैं। हर बात में कुछ न कुछ अच्छाई छुपी ही होती है। चाहे वो हार हो, या जीत। या फिर जीत से बस एक कदम दूर रह जाना। हम हमारे पिछले कामो से जितना सिख सकते हैं उतना शायद किसी और अनुभव से नहीं। क्योकि वो हम पर बीती होती हैं। 

हा मैं मानता हूँ की कई बार किसी किसी परिस्तिथि में कुछ Positive ढूंडना बहुत ही अधिक कठिन होता हैं। पर फिर भी आप अपनी परेशानी को देखे समझे। और फिर विचार करें की क्या इसे इतना समय देना ठीक भी हैं?

आपके साथ जो कुछ भी घटता हैं। उसमे कुछ न कुछ सिख होती ही है। हम देखते है ऐसे कई लोग हमें दिख जाते है या हम उनके बारे में Paper में पढ़ते है। जो किसी घटनावश या Accident में अपने कुछ महत्वूर्ण अंग खों दिए। पर फिर भी वे महान कार्य कर जाते है For Example : Helen Keller, जो सुन नहीं सकती थी। बोल नहीं सकती थी और देख भी नहीं सकती थी। पर फिर भी एक महान लेख़क और झुजारु महिला के रूप में जानी जाती है.। या फिर किसी को पढने के लिए संघर्ष करना पड़ा। और मेहनत कर उसने उस समस्या को खत्म कर दिया। फिर बच्चो के पढने के लिए NGO खोला। 

मान लीजिये आप साइकिल से गिर गए है। तो ये देखे की आप क्यों गिरे? क्या साइकिल में कोई गड़बड़ी थी? या आप ठीक से नहीं चला रहे थे? या फिर किसी और की गलती से आप गिर गए। आप निरिक्षण करके इस गलती से दोबारा बच भी सकते है। और अधिक सावधान भी हो सकते हैं। 

विश्वास -2 : Failure का कोई अस्तित्व ही नहीं है । 
फिर से साइकिल का example ले रहा हूँ। आपने जब साइकिल चलाना सीखी होगी तो गिरे होगे? कई बार। पर चलाने की Practice तो नहीं छोड़ दी न?
किसी Doctor को college के एडमिशन के लिए बहुत ही Tough Exams और Competition फेस करना पड़ता है। कई बार पहले प्रयास में ऐसा नहीं हो पाता। तो वे हार मानकर बैठते नहीं। वे थोड़ी और मेहनत करते है। बुद्धिमान लोग खुद को Analyze  करते है, उनसे क्या और कहा गलती हुई। और फिर दूसरा प्रयास करते। इसी तरह IAS exams को भी देखा जाता हैं। 

कहना सिर्फ इतना है की कई बार हम लोग fail  होगे ही। अगर आप ऐसी कोई चीज़ करने जा रहे है। जो आप करना चाहते है। पर आपको उसका अनुभव नहीं तो आप कम से कम एक बार तो fail होगे ही। पर उस काम को छोड़ देना। कोई समझदारी नहीं है। 

हार का कोई अस्तित्व ही नहीं हैं। अस्तित्व है अनुभव का। जो हमें मिलता है। हमारी हार से। हमें समझाती हैं हमारी गलतिया। और गलतियों से हम बेहतर बनते है। यदि आपसे अभी तक कुछ गलती हुई ही नहीं। तो congrats। पर फिर शायद आपने कुछ नया कभी try ही नहीं किया। क्योंकि अगर करते। तो आप यक़ीनन एक बार तो fail जरुर होते। 

विश्वास -3 : अपने कार्यों की ज़िम्मेदारी लें,  चाहे कुछ भी हों । 

बहुत ही आसन होता है। दूसरों की गलतीयाँ बताना। दूसरों को Blame करना। पर वास्तव में Leader वही होता है जो अपनी गलतीयों की जिम्मेदारी खुद लें। 

हम सभी ने ये सब शब्द सुने ही होगे:

अरे Tution में ठीक से पढ़ाया नहीं, इसलिए कम Marks आये। 

(क्या आपने खुद से समय देना उचित नहीं समझा ?)

अरे वो तो मैं उस दिन Absent था। इसलिए आज Assignment दे नहीं पाया। (क्या आप अपने किसी दोस्त से, या डायरेक्ट Teacher से नहीं पूछ सकते थे?)

अरे वो तो मेरे मम्मी पापा ने कहा की Engineer बन जा। नहीं तो मैं एक अच्छा सिंगर बन जाता। (ये आजकल का सबसे फेवरेट बहाना है। आप अपने सपनो के लिए यदि घर पर नहीं समझा सके। नहीं टिक सके। तो बाहर क्या करेंगे?)

हम दूसरों पर गलतीयाँ थोप देते है। खुद को सुरक्षित रखने के लिए। खुद को साफ़ बतलाने के लिए। अगर गांधीजी कोई गलती करते तो वो उसे स्वीकार करते। स्टीव जॉब्स से कई गलतिय हुई जिसके लिए उन्हने माफ़ी मांगी। और सारी जिम्मेदारी खुद लीं। अगर मैं अपनी हार का ठीकरा किसी और पर फोड़ता रहूगा। तो सफ़लता कभी नहीं मिल पायेगी। और मेरे क़रीबी भी मुझसे दूर हो जायेगे। केवल इस डर से की कहीं ये हम पर भी कभी ऐसा कोई धूर्त सा आरोप न लगा दें। 

आप स्वयं समझदार हैं। अपनी गलती मान लेने से बहुत ही सुकून फील होता हैं। try करके देखिये। और इससे गलती के लिए माफ़ी की संभावना बढ़ जाती हैं।

विश्वास -4 : आपके साथी आपके मददगार है।   

boss #1     मुझे यकीन है आप सभी अपनी Life में किसी ऐसे एक व्यक्ति से जरुर मिले होंगे। जिसने आपको कभी कोई क्रेडिट दिया ही नहीं। हमेशा काम का बोझ। कभी Thank You भी नहीं 
कहा। जबकि आप उसका सारा कार्य करते हैं। 

boss #2     ऐसे व्यक्ति से भी मिले होगे। जो वास्तव में आपकी बड़ाई करता है। आपको प्रोत्साहित करता हों। यदि आपका दिन कुछ ख़ास अच्छा न जाए काम में। तो आपको हौसला देते है। और गलती करने पर समझाते हुए कोई बात नहींभी कहते हैं।
मुझे यकीन है की यदि आप कोई Job करते है तो #2 जैसा कोई boss चाहेंगे। ऐसे व्यक्ति होते है। जो लोगों को साथ लेकर चलते हैं। 

पर क्या आप ऐसा Leader नहीं बनना चाहेंगे। जिसे देखकर सभी खुश हो जाये। जिसे देखकर सब डरने के बजाय सब स्माइल करें। 

पिछले पॉइंट हमने पढ़ा की, अपनी असफ़लता की जिम्मेदारी स्वयं लें।
और अब कह रहा हूँ की, अपनी सफ़लता का श्रेय उसका Credit  सभी को दें।
अपने छोटे साथियो से लेकर अपने पार्टनर्स तक सभी को मुबारक दें। सभी से हाथ मिलाये। उन्हें हौंसला दें। 

आप यदि अच्छा Treat चाहते है। तो पहले दूसरों को भी तो वैसा व्यवहार दीजिये। 

विश्वास -5 :  आपका कार्य आपका मनोरंजन है। 

क्या आपने कभी ऐसे व्यक्ति के बारे में सुना है। जो अपने काम को बिलकुल भी पसंद नहीं करता था, जो अपने काम से बोर था और नफ़रत करता था, पर फिर भी सफल हुआ? नहीं न? मैंने भी नहीं सुना। 

जितने भी महापुरुष और महिलाये रही है। और जितने भी आज की तारीख में सफल लोग है। जिनके बारे में आप पढ़ते है। उन्हें TV  में देखते है। जिनपर चर्चा करते है। 

वो सभी अपने अपने काम से प्यार करते थे  हैं। इसीलिए वे इतनी बुलंदियों तक देखते ही देखते पहुँच गए। इसलिए वे इतने सफल है। 

बाकि फिर 3 idiots की लाइन आपको बेहतर समझा सकती हैं। 


 “सचिन तेंदुलकर के पापा उसे बोलते की तू सिंगर बन जा

या लता मंगेशकर के पापा बोलते की तू फ़ास्ट बॉलर बन जा.

तो वो दोनों आज कहाँ होते?”


सोच के देखिये। 


ये वो कुछ 5 ऐसे Belief थे जिन्हें अपनाकर कई लोग महान सफलता को प्राप्त कर गए। हम भी शायद थोडा बहुत लाभ तो ले ही सकते हैं।
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